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* ये जीवन दो दिन का मेला *

भूरचन्द जयपाल

भूरचन्द जयपाल

कविता

April 9, 2017

मन काहे का गुमान करे,
ये जीवन दो दिन का मैला

फिर मन काहे फूला-फूला
इतरायें क्यूं तन पर भूला

ये जीवन दो दिन का मेंला
फिर क्यूं अपनों में फूला

दुनियां का है खेल निराला
वहम सभी ने ऐसा पाला

हम बडा है हम बडा हैं
औरन छोटा और हम बडा

तन में है मेहमान मन
जाना इक दिन पहचान

आना जाना इस दुनियां में
सब माया-खेल समझना

नाम प्रभु का ले ले मनवा
वरना जग रह जाये अकेला

इस जग में ना कोई अपना
जान ले केवल इसको सपना

दुनियां है दो दिन का मेंला
खेल-खेल बीत जायेगा चेला

मन काहे का गुमान करे
ये जीवन दो दिन का मेला ।।

?मधुप बैरागी

Author
भूरचन्द जयपाल
मैं भूरचन्द जयपाल स्वैच्छिक सेवानिवृत - प्रधानाचार्य राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, कानासर जिला -बीकानेर (राजस्थान) अपने उपनाम - मधुप बैरागी के नाम से विभिन्न विधाओं में स्वरुचि अनुसार लेखन करता हूं, जैसे - गीत,कविता ,ग़ज़ल,मुक्तक ,भजन,आलेख,स्वच्छन्द या छंदमुक्त रचना आदि... Read more
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