कविता · Reading time: 1 minute

ये कैसी पनघट की डगर

ये कैसी पनघट की डगर

ये कैसी पनघट की डगर ,जिसका न कोई हमसफ़र
चल पड़े घर की ओर , सूझती नहीं कोई डगर

जिसने पूछा हाल मेरा, वो हो गया मेरा रहबर
जिसको न मिला रहबर , वो भटक रहा दर – दर

सड़कों पर हैं बच्चे जन्मे , ट्रेनों ने भी सही ये पीड़ा
अभिमानी नेता न जाग रहे, किसे सुनाएँ विपदा

सड़कें लहू की हो रही प्यासी , ट्रेन भी जुल्म ढहाए
किसको रोयें किसे न रोयें , कोई तो घर पहुंचाए

पैदल जंग बहुत हैं हारे, कुछ भूखन के मारे
नेतन से अब हुआ मोहभंग , पड़ेंगे वोटन के लाले

पार्टी फण्ड के दानी अब सब छुपे कहाँ हैं सारे
मानवता चीख – चीख पुकारती, निकलो नेताओं के प्यादे

धर्म के ठेकेदारों के अब दर्शन नहीं हैं होते
धर्म का डंका पीटने वाले, अब हैं घरों में सोते

मानव बदला मानवता बदली , मानव हुआ अनाथ
सबके दाता राम तो फिर हमरे कौन हैं नाथ

माँ बहनों का प्यार, आ रहा याद हम सबको
कष्ट की इस त्रासदी में , कोई बचाओ हमको

कोरोना की मार ने सबसे ज्यादा हमें रुलाया
राजनीति के ठेकेदारों से रूबरू हमें कराया

ये कैसी पनघट की डगर ,जिसका न कोई हमसफ़र
चल पड़े घर की ओर , सूझती नहीं कोई डगर

जिसने पूछा हाल मेरा, वो हो गया मेरा रहबर
जिसको न मिला रहबर , वो भटक रहा दर – दर

नोट – यह रचना कोरोना काल में लिखी गयी है |

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मैं अनिल कुमार गुप्ता , शिक्षक के पद पर कार्यरत हूँ मुझे कवितायें लिखने , शायरी , गीत , ग़ज़ल , कहानियां और लेख लिखने का शौक है । मैंने…
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