Jul 18, 2017
कविता · Reading time: 1 minute

ये कैसी अखबार

ये कैसी अखबार मै पढ़ने लगा हूं
दिन दहाड़े सबके सामने झपट मारी
रोज बेआबरू होती अबला नारी
छोटी छोटी बातों मे मारा मारी ।

ये कैसी अखबार मै पढ़ने लगा हूं
भ्रष्टाचार मे लिप्त तंत्र सरकारी
इमान पे होता जाता पैसा भारी
हर इक इंसान हो रहा लाचारी ।

ये कैसी अखबार मै पढ़ने लगा हूं
खुद को समझदार कहता है अधिकारी
दिन रात जेब भरता है अपनी बेशुमारी
कहता है अपने को कानून का प्रहरी ।

ये कैसी अखबार मै पढ़ने लगा हूं
बच्चों को लगते है मां बाप अत्याचारी
कर रहे हैं मां बाप कत्ल बचपन की क्यारी
गूंगा बहरा हो गया है गांवी हो या शहरी ।।

राज विग

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