“ये कैसा सावन”

ये कैसा सावन आया,
कैसी ये वर्षा ऋतु |
तन भीगा, मन कोरा,
नाचा नहीं ये मन मयूर|
ना झूला ना कजरी,
केवल मेघों का है शोर|
नौनिहलों की नाव कहाँ,
केवल बस्तों का है बोझ|
दादुर भी अब मौन हुए,
अब नहीं पपीहे के बोल ||
…निधि…

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"हूँ सरल ,किंतु सरल नहीं जान लेना मुझको, हूँ एक धारा-अविरल,किंतु रोक लेना मुझको" View full profile
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