Aug 6, 2016 · गीत
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ये कैसा शरारा है.

दरिया में ही ख़ाक हुए, ये कैसा शरारा है.
साहिल पे ही डूब गए, ये कैसा किनारा है.
यहाँ छांव जलाती है,मुस्कान रुलाती है.
रातों में खुद को खुद की ही, परछाईं डराती है .
ये कौन सी दुनिया है, ये कैसा नज़ारा है.
साहिल पे ही डूब गए, ये कैसा किनारा है.
बीच भंवर में अटक गए, मंजिल से हम भटक गए.
वक़्त ने ऐसा पत्थर फेंका, सारे सपने चटक गए.
मालिक तेरी रहमत ही , बस एक सहारा है.
साहिल पे ही डूब गए, ये कैसा किनारा है
——– सतीश मापतपुरी

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Satish Mapatpuri
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I am freelancer Lyricist,Story,Screenplay & Dialogue Writer.I can work from my home and if required... View full profile
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