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ये इंतजार

विनोद कुमार दवे

विनोद कुमार दवे

शेर

October 7, 2016

दुनिया के अपने रिवाज ओ रवायतें है प्यार करने के,
बस नफ़रत पर कोई पाबन्दी नहीं।
*** ***
बेहिसाब बिजलियों की लपटे अपने दामन में समेटे है,
उसे छुआ भी नही और बेहोश हो गए।
कितने मयखाने उसके लबों पर मुस्कुराते रहते है,
बिना चूमे ही हम मदहोश हो गए।
*** ***
ये इन्तजार, ये रात कभी रुखसत नहीं होंगे इस ज़िन्दगी से,
ये मुकद्दर की बातें है ख़ुदा जाने क्या होगा।
कभी सुबह की चटख धुप भी खिलेगी,
या जाने सिर्फ़ धुँआ धुँआ होगा।
*** ***
हर शख़्स की आँखों में मुर्दापन छाया है,
पता नहीं ‘दवे’ ये शहर है या शमशान।

Author
विनोद कुमार दवे
परिचय - जन्म: १४ नवम्बर १९९० शिक्षा= स्नातकोत्तर (भौतिक विज्ञान एवम् हिंदी), नेट, बी.एड. साहित्य जगत में नव प्रवेश। पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।अंतर्जाल पर विभिन्न वेब पत्रिकाओं पर निरन्तर सक्रिय। 4 साझा संकलन प्रकाशित एवं 17 साझा संकलन प्रकाशन... Read more
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