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ये आंखे

pratik jangid

pratik jangid

कविता

September 23, 2016

अन कहे शब्दों को बयां कर जाती हें I
एक अजनबी से ये आंखे न जाने क्या कह जाती हैं I
इक रिश्ता सा बन जाता हें उस अजनबी से I
उस अजनबी को अपना बना जाती है I
न जाने ये आँखे एक अजनबी को क्या कह जाती है I
फिर
हर पल उनकी यादो के बादल गरजते हें I
जब बरसते हें तब ये आँखे नम सी जाती हैं I
फिजाओ के दामन में यादो की लहरे चला करती हें I
जब उस अजनबी की याद बहुत सताती है I
न जाने ये आँखे एक अजनबी को क्या कह जाती है I

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Author
pratik jangid

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