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ये आँशू किसके लिये

अपनो ने अपनापन तोडा
गैरों की तो बात ही क्या
उम्मीद भी नाउम्मीद अब
भला ये आँशू किसके लिये..
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सुनो बेटा अब बडा आदमी बन गया
व्यस्त रहता है खुदी में
मैं तो सोच में हूँ , वो मेरे
बगैर कैसे जो रहता होगा
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आज जरुरत है मुझे अपनों की मगर
हालातो से मुख्तकर है
लगता अपना नहीं अब कोई
भला ये आँशू किसके लिये
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खुदा तू आ के देख जरा
इंसा बहुत बदल गया
मेरे तो आखें भी नम हैं मगर
भला ये आँशू किसके लिये
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जिसपे भरोसा किया
भरोसा भ्रम हो गया
तडप उठती हैं आंखें अब मगर
भला ये आँशू किसके लिये
—————– —–
——————-बृज

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Brijpal Singh
Brijpal Singh
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मैं Brijpal Singh (Brij), मूलत: पौडी गढवाल उत्तराखंड से वास्ता रखता हूँ !! मैं नहीं...