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ये आँशू किसके लिये

Brijpal Singh

Brijpal Singh

कविता

June 26, 2016

अपनो ने अपनापन तोडा
गैरों की तो बात ही क्या
उम्मीद भी नाउम्मीद अब
भला ये आँशू किसके लिये..
—————-
सुनो बेटा अब बडा आदमी बन गया
व्यस्त रहता है खुदी में
मैं तो सोच में हूँ , वो मेरे
बगैर कैसे जो रहता होगा
——————
आज जरुरत है मुझे अपनों की मगर
हालातो से मुख्तकर है
लगता अपना नहीं अब कोई
भला ये आँशू किसके लिये
—————
खुदा तू आ के देख जरा
इंसा बहुत बदल गया
मेरे तो आखें भी नम हैं मगर
भला ये आँशू किसके लिये
—————–
जिसपे भरोसा किया
भरोसा भ्रम हो गया
तडप उठती हैं आंखें अब मगर
भला ये आँशू किसके लिये
—————– —–
——————-बृज

Author
Brijpal Singh
मैं Brijpal Singh (Brij), मूलत: पौडी गढवाल उत्तराखंड से वास्ता रखता हूँ !! मैं नहीं जानता क्या कलम और क्या लेखन! अपितु लिखने का शौक है . शेर, कवितायें, व्यंग, ग़ज़ल,लेख,कहानी, एवं सामाजिक मुद्दों पर भी लिखता रहता हूँ तज़ुर्बा... Read more
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