कविता · Reading time: 1 minute

यूं होके रूसवा क्यों चल दिये तुम

यूं होके रूसवा क्यों चल दिये तुम,
जो हम न बोले वो सुन गये तुम।

तुम्हारे जैसा मिला था कोई,
हमारे जैसा जो सोचता था,
मेरे खयालों के इस जहाँ में,
ये टूटे तारे क्यों बून गये तुम।

बना के आलम, सजा के चेहरा,
तुम्हारी आंखों मे खुद को देखा,
दिखे अकेले हमीं खड़े थे,
न जाने किस मोड़ मूड़ गये तुम।

गूलाब की हर ताज़ा कली से,
यूं नरमी ले हम उधार आये,
हमारे हिस्से में जो हैं बिखरें,
ये चंद कांटे क्यों चून गये तुम।

यूं होके रूसवा क्यों चल दिये तुम,
जो हम न बोले वो सुन गये तुम।

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