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यूँ कि हम बोलते बहुत हैं पर कहना नहीं आता

suresh sangwan

suresh sangwan

गज़ल/गीतिका

December 11, 2016

यूँ कि हम बोलते बहुत हैं पर कहना नहीं आता
जीये रहगुज़र में दिल में तो रहना नहीं आता

आने से चला है किसी के न जाने से रुका है
जिंदगी के कारवाँ को कभी ठहरना नहीं आता

वो जीया ना जीया दुनियाँ में बराबर ही रहा
जिसको क़ौस-ओ-कज़ा बनकर बिखरना नहीं आता

साथ देते हैं लोग ज़माने की हवा को देखकर
अँधेरों में साये को भी संग रहना नहीं आता

अपने बनाए दायरे में खुश रहता है वो क्यूँकि
हालात के मुताबिक़ बंदे को ढलना नहीं आता

नहीं दरकार वाह-वाही की बस लिखना है मुझे
दिल को किसी एतराज़ से सिहरना नहीं आता

खुद लिखनी है अपनी उगाई फस्ल-ए-गुल की महक
बोलो कौन कहता है ‘सरु’ को लिखना नहीं आता

क़ौस-ओ-कज़ा —-इंद्रधनुष

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Author
suresh sangwan

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