युवकों का निर्माण चाहिए

युवकों का निर्माण चाहिए, युवकों का निर्माण चाहिए
कलियुग के कलुषित तम हिय को,चीर सके वह बाण चाहिए

सज्जनता की ढाल रो रही,काम-क्रोध जयमाल हो रही
विचलित नर के रोम-रोम में लिप्सा की सुरताल हो रही
बेटा बोले बात न मानू,पापा मुझे प्रमाण चाहिए
युवकों का निर्माण चाहिए, युवकों का निर्माण चाहिए

अवनति औ उपहास बने हम,बंधन सह दुख-ग्रास बने हम
विकसित हैं, लेकिन अवशादी, चंद्रग्रहण खग्रास बने हम
झट तलाक है,रोयी खाट हैं, प्रेम-शांति का त्राण चाहिए
युवको का निर्माण चाहिए युवकों का निर्माण चाहिए

सीखे नाहीं बिज्ञ ककहरा, मदिरा पीकर मना दशहरा
जड़ बनकर भ्रम- भँवर मध्य फँस,घूम रहा नर, दुख अति गहरा
सुप्त-अचेतन हिय स्वराष्ट्र को, अब चेतना कृपाण चाहिए
युवकों का निर्माण चाहिए, युवकों का निर्माण चाहिए
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बृजेश कुमार नायक
“जागा हिंदुस्तान चाहिए” एवं “क्रौंच सुऋषि आलोक” कृतियों के प्रणेता
02-05-2017
“जागा हिंदुस्तान चाहिए”कृति की रचना
पेज संख्या-20

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