Apr 5, 2020 · कविता

युग प्रवर्तक दीप जल

युग प्रवर्तक दीप जल प्रतिदिन प्रतिपल
दिव्य ज्योति प्रकाशित कर जग में प्रतिक्षण
अज्ञानता रूपी अन्धकार को चीरकर
ज्ञान का सिन्धु बिखरा अपरिमित

प्रकृति सुशोभित रहे झर कुसुम बिखरे अपरिमित
वृक्षों पर हो विहंग गान पुष्पों पर षटपद गुंजार
आज पुनः इस धरा पर नव चेतना जागृत हो
संघर्षों से जीत भारत में खुशहाली का आगाज हो

मानवता के गुण दया ममता स्नेह से हो परिचित
नई सोच नये विचार श्रृंखला की कड़ियां
तपोभूमि भारत पर आज फिर से
मर्यादा पुरुषोत्तम राम के आदर्शों का पालन हो

नवक्रान्ति संकल्पों का उदघोष हों यहां
अनेकता में एकता की सदा रहे नींव
भारत वासियों का पथ आलोकित कर
युग प्रवर्तक दीप जल प्रतिदिन पतिपल

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