May 11, 2021 · मुक्तक
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यार मेरे

आरजू थी वस्ल की ग़म तो बेशुमार था,
था मेरे ख़िलाफ़ जो वह तो मेरा यार था,
मैं मुहब्बत के चरागों को जरा सम्हालता,
मुझको मिटाने में लगे दो यार में करार था,

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अखिलेश 'अखिल'
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"लिखता नहीं लिख के मिटाता हूँ, कह न सका जो गीत वही गाता हूँ" जन्म-10... View full profile
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