गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

जानाॅं

तुम्हें खोजते रहना और खुद को ही खो देना
बस यही इक काम अब रह गया है मेरा जानाॅं

सावन के अंधे को ज्यूॅं सब हरा हरा ही दिखता है
मुझको भी चारों तरफ तू ही तू खड़ा दिखता है जानाॅं

ज़िन्दा जिस्म में बालिस्त भर ठहाका ओढ़े… मुर्दा सी मैं
स्याह रात के सीने पे सितारों के महफिल में चाॅंद से तुम जानाॅं

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