Apr 26, 2017 · कविता
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याद हो तुम्हे, पूछा था तूमने

जमाने बाद तुम्हारे एक प्रशन का उत्तर दे रहा हूँ अब

याद हो तुम्हे
पूछा था तुमने ,, चंचल आँखो से भी क्यो कर इतने मौन हो तुम ?

इतना धनिक नही था मै उन दिनो जो शब्दो मे तुमको अपनी प्रियसी बता पाता

उखड़े टूकड़े शब्दो मे बता भी देता
की
तुम कितनी प्रिय हो मुझको
बिफर जाती तुम
जानता हूँ
उन बयारो से भी लड़ती
जो तुम्हारा मन टटोले मकांन मे मेरे आ जाती थी

मन की ऊहा पोह मे, मै मौन हो चला था
तरूणी तुम्हारी वैभवता देख के

अब भी अंदर से वैसा ही हूँ मै
थोड़ा और विक्षिप्त सा
पराई सरहद की तुम अब हो
और मै इस सरहद पर हूँ मौन खड़ा
प्रेम सरहद पर मेरी गर्जना से
मूमकिन है
एक मन मे तुम्हारे ,, युद्ध सा हो
अब नैतिक भी है कि जीवन ” सदा मै ” मौन रहू

एक जमाने बाद तुम्हारे एक प्रशन का उत्तर दे रहा हूँ अब
याद हो तुम्हे
पूछा था तुमने ,,,,,,,,

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Sadanand Kumar
Sadanand Kumar
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मै Sadanand Kumar , Samastipur Bihar से रूचिवश, संग्रहणीय साहित्य का दास हूँ यदि हल्का... View full profile
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