कविता · Reading time: 1 minute

याद आई आज़ादी

मेरी कलम से…..✍

तीन सौ चौंसठ दिन बीत गए,
न याद रही कोई आज़ादी।
मगर पंद्रह अगस्त आते ही,
बरबस याद आई आज़ादी।।

चलो भूले बिसरे ही सही,
कम से कम याद तो आई
आज़ादी।
उठा तिरंगा हाथों में अब
करने लगे मुनादी।।

नेता जी और अधिकारी
जी ने,
की घोषणा जश्न मनाने की।
दो निमन्त्रण खास मेहमानों
को,
करो तैयारी तिरंगा फहराने
की।।

गंदगी से भरा पड़ा था जो,
खुल गयी किस्मत उस
मैदान की।
साफ किया मैदान फ़ौरन
क्योंकि…….
पंद्रह अगस्त को नेताजी
लहरायेंगे,
उसपर तिरंगा शान हिंदुस्तान
की।।

फिर भाषण होगा आज़ादी
पर,
और अखबारों में नाम
लिखवाएंगे।
सोलह अगस्त की सुबह होते
ही,
पंद्रह अगस्त को भूल जाएंगे।।

पन्द्रह अगस्त रिवाज़ बन
गया,
अपनी झूठी शान दिखाने का।
जिन्होंने आज़ादी दिलाई थी,
उन जांबाज़ों को भूल जाने का।।

अब कौन याद करता है उन,
आज़ादी के दीवानों को।
सर कटवाकर शहादत दी
जिन्होंने,
उन भारत माँ के मस्तानों
को।।

महँगाई भ्रष्टाचार बेईमानी
ने,
देश को फिर से गुलाम
बनाया है।
कहने को तो अंग्रेज़ चले
गए,
मगर हिंदी से ज्यादा अंग्रेज़ी
ने नाम कमाया है।।
संजय गुप्ता।

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