कविता · Reading time: 1 minute

यादो का गुलिस्ताँ……….

तुम चले तो गये अजनबी बनकर
मगर यादो का गुलिस्ताँ अभी मेरे पास है ……….!
सजाए बैठा हूँ इस उम्मीद में
मिलोगे कभी जिंदगी के किसी मोड़ पर ………….!
खिदमत ऐ पेश करूँगा स्वागत में,
एक एक शब्द महक उठेगा गुलदस्ते में याद बनकर ..!!
!
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!
डी. के. निवातियाँ _________@

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