यादों के ये खजानें रहनें भी दीजिए

*** यादों के ये खजानें रहने भी दीजिए ***

तानें और उलहानें , रहने भी दीजिए
मिलनें के कुछ बहाने , रहने भी दीजिए

ये बेरूखी , जफाऐं , सोने नही देती
सपनें वही सुहानें , रहने भी दीजिए

यूं तोड के शीशा , मिटा ना निशानियां
कुछ ठौर , ठिकाने , रहने भी दीजिए

नफरत है तुझे मुझसे , जमानें को ना बता
उल्फत के ये फसानें , रहने भी दीजिए

मै लिख रहा हूँ जाना , गजलों की एक किताब
होठों पै कुछ तराने , रहने भी दीजिए

ये जिन्दगी ” सागर ” , मिले ना मिले कभी
यादों के ये खजानें , रहने भी दीजिए !!
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बैखोफ शायर/गीतकार/लेखक
डाँ. नरेश कुमार “सागर”

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