" यादों की धुंध "

सनम तुम्हारी यादों की धुंध
दिन-प्रतिदिन गहन होती जा रही है,
क्योकिं तुमने अपनी यादों के चिराग़
बूझा डाले हैं !
मग़र मै आज भी उसी उजाले का भ्रम पाले
काली सर्द रातों के घोर तिमिर में
वफ़ाओं की कश्ती में सवार हो
मंज़िल की चाह में
बढ़ती जा रही हूँ !
क्योकिं उस मिलन की महक आज भी
मेरे दिल की बगिया में
कस्तूरी सी फ़ैल रही है !
पार पाना चाहती हूँ मै
इस छोर से उस छोर पर
जहाँ से आगाज़ हुआ था
इक नई ज़िन्दगी का
बीज पनपे थे,उस वीराने में
अपनी मुहब्बत के
गवाह हैं आज भी वो
मेरे बिस्तर की सिलवटें
वो छुई-मुई सा शर्माना
बात-2 पर रूठ जाना
फिर एक मुस्कान से
तुम्हारे दिल में तूफ़ाँ सा आ जाना,
नहीं भूली हूँ मैं
वो वायदे वो कसमें
जो खाये थे उस झील के किनारे
प्रियतम आज भी उम्मीद है
कि छटेंगी ये यादों की धुंध !!
……..
कुलदीप दहिया ” दीप “

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