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यादों की गठरी

विनोद कुमार दवे

विनोद कुमार दवे

कविता

September 24, 2016

उन्हें याद नहीं आती हमारी, गुरुर में,
वो खोये है जाने किस सुरूर में।

जिस वक़्त के लम्हात ने हमको रुलाया है,
उस वक़्त का झोंका तेरी गली में आया है।

इस बार तेरी यादों की गठरी बनाएंगे,
ख़ुद भी जलेंगे और तेरी यादें जलाएँगे।

इस बार जो हम रूठे तो ऐसे रूठ जाएंगे
वहां चले जाएगे जहां आप मनाने नही आ पाएंगे।

हर बार हम रोये तो तुम कीमत न जानोगी,
हमारी याद मैं तुम्हें रुलाकर अश्कों की कीमत बताएंगे।

Author
विनोद कुमार दवे
परिचय - जन्म: १४ नवम्बर १९९० शिक्षा= स्नातकोत्तर (भौतिक विज्ञान एवम् हिंदी), नेट, बी.एड. साहित्य जगत में नव प्रवेश। पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।अंतर्जाल पर विभिन्न वेब पत्रिकाओं पर निरन्तर सक्रिय। 4 साझा संकलन प्रकाशित एवं 17 साझा संकलन प्रकाशन... Read more
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