गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

यह प्रेम दिवस कैसा?

धरा के अधर सूखे तो जलद से आस थी बाँधी
तृषा है धरा की बाँकी जलद आँगन नहीं आया।

यद्यपि रंग बिरंगे सुमन खिले उपवन में
किन्तु उमंग न कोई मुरझाये मन में
हिय हैं प्रमुदित जिनके मनमीत संग
वंचित हृदयों को क्या भाए जीवन में

वचन दिया था मिलने का मिलने आते
वचन निभाते चाहे प्राण चले जाते
प्रेम दिवस पर “विरह- व्यथा” उपहार दिया
ऐसे भी क्या कोई प्रेमी प्रीत निभाते?

गये जो प्राण चातक के स्वाति की बूंद अपराधी
तृषा कैसे बुझाता जलद मनभावन नहीं आया।

आज प्रेम के अक्षर ढाई पढ़ने का दिन था
आज स्वप्न के किले हवाई गढ़ने का दिन था
प्रेमी हृदयों के बैरी हैं जग बाले
बैरी जग से आज लड़ाई लड़ने का दिन था

प्रिय से नयन चार होते कुछ बातें होतीं
प्रेम दिवस होता तो फिर क्या रातें होतीं
नीर भरे दृग धीर धरे ना होते तो
आशा धूमिल होते ही बरसातें होतीं

ये कहकर आँसुओं से रोक ली बरसात की आँधी
अभी ठहरो नयन- घन में अभी सावन नहीं आया।

संजय नारायण

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