यह नगरी है (४)

यह नगरी है ,
भक्तों की , परम विरक्तों की ।
बगुले जैसा ध्यान लगाते​ ।
फिर भी मछली पकड़ न पाते ।
यज्ञ कराते भजन कराते ।
रामायण का पाठ कराते ।
हज़ करते रोजा रखते हैं ।
व्रत रखते कीर्तन गाते है ।
थोड़ी-बहुत मदद भी करते ।
उसका सब पर रौब़ जमाते ।
यद्यपि अकर्मण्य हैं यह सब ,
फिर भी कर्मवीर कहलाते ।
केवल शोषण ही करते हैं ,
फिर भी ये पोषक कहलाते ।
परधन की ही बाट जोहते ,
स्त्रियों के आसक्तों की ।
यह नगरी है ,
भक्तों की परम विरक्तों की ।

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