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यह नगरी है (३)

ईश्वर दयाल गोस्वामी

ईश्वर दयाल गोस्वामी

कविता

April 8, 2017

यह नगरी है ,
संतों की , परम महंतों की ।
जटा-जूट लम्बे-चौड़े हैं ।
पर विचार इनके भौंड़े हैं ।
तिलक है लम्बा चिंतन छोटा ।
धर्म-कर्म सब इनका खोटा ।
यज्ञ कराते चन्दा लेते ।
बदले में फिर राख बेचते ।
ब्रह्मचर्य का झांसा देकर ,
महिलाएं आकर्षित करते ।
डींग हांकना इनका पेशा ,
केशरिया इनका बाना है ।
हम समाज के उद्धारक हैं ,
ऐंसा ही इनका नारा है ।
ये जो कहते वहीं सत्य है ।
बाकी दुनियां​ सब असत्य है ।
शून्य से आगे जिनकी गणना ,
ऐसे परम अनंतों की ।
यह नगरी है ,
संतों की , परम महंतों की ।

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Author
ईश्वर दयाल गोस्वामी
-ईश्वर दयाल गोस्वामी कवि एवं शिक्षक , भागवत कथा वाचक जन्म-तिथि - 05 - 02 - 1971 जन्म-स्थान - रहली स्थायी पता- ग्राम पोस्ट-छिरारी,तहसील-. रहली जिला-सागर (मध्य-प्रदेश) पिन-कोड- 470-227 मोवा.नंबर-08463884927 हिन्दीबुंदेली मे गत 25वर्ष से काव्य रचना । कविताएँ समाचार... Read more
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