यह नगरी है (३)

यह नगरी है ,
संतों की , परम महंतों की ।
जटा-जूट लम्बे-चौड़े हैं ।
पर विचार इनके भौंड़े हैं ।
तिलक है लम्बा चिंतन छोटा ।
धर्म-कर्म सब इनका खोटा ।
यज्ञ कराते चन्दा लेते ।
बदले में फिर राख बेचते ।
ब्रह्मचर्य का झांसा देकर ,
महिलाएं आकर्षित करते ।
डींग हांकना इनका पेशा ,
केशरिया इनका बाना है ।
हम समाज के उद्धारक हैं ,
ऐंसा ही इनका नारा है ।
ये जो कहते वहीं सत्य है ।
बाकी दुनियां​ सब असत्य है ।
शून्य से आगे जिनकी गणना ,
ऐसे परम अनंतों की ।
यह नगरी है ,
संतों की , परम महंतों की ।

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-ईश्वर दयाल गोस्वामी कवि एवं शिक्षक , भागवत कथा वाचक जन्म-तिथि - 05 - 02... View full profile
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