यह नगरी है (२)

यह नगरी है ,
सिद्धों की, परम प्रसिद्धों की ।
कान खड़े रहते हैं जिनके ,
परनिंदा हरक्षण सुनने को ।
नाक सदा जो पेंनी रखते ,
गंध घृणा की ही लेने को ।
मुंह भी लम्बा-चौड़ा करते ,
धर्म-कर्म की डींग हांकने​ ।
आंखें सदा टिकाए रहते ,
परस्त्री की देह ताकने ।
सूखकर ज्यों डाल गिरी रूख से ।
आदमी ज्यों मर गया हो भूख से ।
उसके मरण-भोज की
आस में बैठे हुए कुछ ,
चीलों , कौओं , गिद्धों की ।
यह नगरी है ,
सिद्धों की , परम प्रसिद्धों की ।

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