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यहाँ “मासूम” रुकना था मगर जाने की जल्दी थी

MONIKA MASOOM

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गज़ल/गीतिका

November 11, 2017

हमें उनकी पनाहों में ठहर जाने की जल्दी थी
उन्हें भी हमको तन्हा छोड कर जाने की जल्दी थी

हम उनकी बात पर थोड़ा यकीं करने लगे थे अब
पर अपनी बात से उनको मुकर जाने की जल्दी थी

सुकूं चैनों की खातिर हम तो गाँवों को चले थे पर
यहाँ गाँवों को शहरों में उतर जाने की जल्दी थी

घङी खुशियों की जी भर के अभी जी भी न पाए हम
क्यों अच्छे वक्त को जल्दी गुजर जाने की जल्दी थी

बङी हसरत से इस दिल में बसाया था उन्हें हमने
मगर उनको तो इस दिल से उतर जाने की जल्दी थी

या कहिए दिल हमारा ही जरा फूलों से नाजुक था
जो इसको ठेस लगते ही बिखर जाने की जल्दी थी

बहुत मुद्दत में हमको रास आई थी कोई महफिल
यहाँ ‘मासूम ‘ रुकना था मगर जाने की जल्दी थी
@मोनिका”मासूम”
15/5/16
मुरादाबाद

Author
MONIKA MASOOM
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