यश के पाँवों में छाले हैं

जो भी घर के रखवाले है,
उनके होंठों पर ताले हैं ।
धूल सभ्यता की आँखों में,
यश के पाँवों में छाले हैं ।

कल तक हम जिन पर थे गर्वित,
वही दृश्य हैं, शोषित- पीड़ित ।
मेधा हुई अपाहिज़ इतनी,
लगता नहीं कभी हो मुखरित ।
लूटा गुलश़न जिन लोगों ने ,
वे गुलश़न के रखवाले हैं ।

पथ-दर्शक उन्मत्त हुए है ,
मानवता का भाव सो गया ।
सरे-आम लुटती है अस्मत ,
मेरा मानव कहाँ खो गया ।
चेहरे जितने कांतिवान हैं ,
मन, अब उतने ही काले हैं ।

नेह धरा का वंजर करके ,
अब क्या पियें अंजलि भरके ।
हम घर में सहमे बैठे हैं ,
अपराधों से अंतर भर के ।
जो थीं दूध – दही की नदियाँ ,
अब केवल गंदे नाले हैं ।

धूल सभ्यता की आँखों में,
यश के पाँवों में छाले हैं ।
जो भी घर के रखवाले हैं,
उनके होंठों पर ताले हैं ।

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