कविता · Reading time: 1 minute

यथार्थ

कितना चीखोगे, कितना चिल्लाओगे,
झूठ के रूप अनेक है,सत्य पकड़ न पाओगे।
दुःख की गठरी साथ है,सुख की मंजिल दूर,
दुविधा यदि मन में रहे,आगे कैसे बढ़ पाओगे।
बात-बात में तर्क है,वादो में प्रतिवाद,
सूत्र आपस में उलझ गए,उनको कैसे सुलझाओगे।
मत-मत में है भिन्नता, इच्छा सबकी एक,
एक -एक ग्यारह बने,न्याय तभी कर पाओगे।
प्रिया खरे

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