कविता · Reading time: 1 minute

यथार्त व्यंग—उल्लू का मन जीत लिया

यथार्त व्यंग =========
मात्रभार /१६-१४
देख जमाने की आदत को , राज बदलना सीख लिया /
उल्लू फौज बराती बनकर , उल्लू का मन जीत लिया /
बढ़ती संख्या जब उल्लू की, दिन मे तम ही छाता है /
दिन को रात रात को दिन कह , सबके मन को भाता है /
राजकिशोर मिश्र ‘राज’ प्रतापगढ़ी

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