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“यकिनन् वो सबला है”

शक्ति की संज्ञा है नारी
विपरित बहाव के बह सकती है,
प्रेम प्रतिमा बनने को
सहर्ष अग्नि में दह सकती है
माया की त्रिकाल स्वामिनी
बुद्दि की इन्द्राणी भी तो सरस्वती है
लाज करो तनिक,
श्वांस से जीवन तेरा भरती वो
कहता जिसे तूं अबला है
संम्पूर्णा है वो, यकिनन् वो सबला है ।

सौन्दर्य का दर्पण है वो
प्रेम की अवबुद्ध गाथा है
शक्ति का वो अन्नत स्रोत
बुद्धि की निश्वार्थ दाता है
हर भाव, व्यंग्य, अहसास को समझती
हर अनुमान की ज्ञाता है
लाज करो तनिक,
चित्रित चरित्र तेरा करती वो
कहता जिसे तूं अबला है
श्रीजननी है वो, यकिनन् वो सबला है ।

काम क्रोध और तृष्णा
इन सब में भी वो है कृष्णा
अग्नि की वो चिंगारी
शीतलता की मूल है
कदम उङी धुल है जो
निर्माण गगन का कर जाती है
लाज करो तनिक,
तनार्पण तक पोषण तेरा करती वो
कहता जिसे तूं अबला है
मृदुमां है वो, यकिनन् वो सबला है ।
देनेन्द्र कुमार ‘अंबर’

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