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मौसम

Deepti Singh

Deepti Singh

गज़ल/गीतिका

February 28, 2017

फ़रवरी की हल्की गुलाबी ठंड थी
सुबह ख़ुद को कोहरे में लपेटे हुए

हल्की हवाओं से ओस को संभाले थी
पेड़ों से गिरती ओस बारिश सी झल रही थी

सूरज आग की धीमी लौ-सा जल रहा था
धीरे धीरे सफ़ेद चादर में पिघल रहा था

कुछ ऐसे सर्द हवाओं के मौसम में
हम भी कुछ अंदर से जल रहे थे

सूरज जैसे धीरे धीरे हम पिघल रहे थे
कुछ गरमाहट-सी थी साँसों में मेरी

इश्क़ का ख़ुमार था दिल पर कुछ ऐसा
हर बात कहि तेरी नशे में लग रही थी

साँसों की गरमाहट उनके पास आने से थी
पिघलती सी शामें अब तेरी बाँहों में थी

कुछ तो नशा है इस मौसम में सनम
हर रात सुबह की दीवानी सी लग रही थी

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Author
Deepti Singh
I'm Deepti Singh from Mathura. A passionate Writer by luck model and a professional software engg. "Jindagi ki kitab ka har ek panna tumhari nayi kahaani hai"
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