कविता · Reading time: 1 minute

मौसम का गीत

नौतपा के तपमें तपकर
अपना धर्म निभाती गर्मी
आह्वान करती मेघों को….अब वे आकर धर्म निभाएँ ।

उत्तम वर्षा, खेती के हित
माटी में दम भरकर गर्मी
लपटों के घोड़े दौड़ा कर …करे प्रतीक्षा बादल छाएँ ।

सूरज ने भी सैनिक छोड़े
खोज खबर मेघों की लेने
साधना से निपटी गर्मी …..सोचे हम भी घर को जाएँ ।

अपना अपना धर्म पालते
क्रमश: मौसम नियमित आते
कभीकभी ध्वनि वायु प्रदूषण…ऋतुओं के मन को भटकाएँ ।

अनुशासन से चले मनुज मन
कर्तव्य को धर्म मानकर
छोटे मन को बड़ा बनाएँ…तब ही तो अच्छे दिन आएँ ।

लक्ष्मी नारायण गुप्त

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