"मौन की आहट"

मौन की भी,
आहट होती है।
सुन सको तो सुनो,
पदचाप उसकी।
बाँटना है तो बाँट लो ,
व्यग्रता उस मौन की।
कल नहीं होगा,
वह आज जिसका।
शूल से भी भयंकर ,
त्रास जिसका ।
सोच कर बैठे थे,
अपने अहर्निश राज को।
भेद गया एक सूक्ष्म सा ,
तिनका वह अदृश्य ।
चलो सुने उस मौन की ,
धारा अविच्छिन्न ।
कर रही जो प्रलाप,
तुम पर प्रतिपल ।
ढूँढ लो अपनी वही,
धरा जो छोड़ आये।
नींव से परे जाकर ,
क्या नीड़ बना पाये ।
जाग जाओ कि अभी ,
समय बीता नहीं ।
अन्यथा करो स्वीकार
भयंकर प्रलय का।
© डा·निधि…

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"हूँ सरल ,किंतु सरल नहीं जान लेना मुझको, हूँ एक धारा-अविरल,किंतु रोक लेना मुझको"
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