-- मौत से पहले एक पेड़ लगाऊं -

कौन करेगा याद
कुछ ऐसा कर जाऊं
और कुछ नहीं तो
अपने हाथ से
एक दरख़्त तो लगा जाऊं

न उस पर शिलापट होगा
न उस पर कोई नाम
बस इच्छा है कुछ
ऐसा ही कर जाऊं काम

भूले भटके कोई मुसाफ़िर
आ बैठे गए छाया में
सकूं मुझ को मिलेगा
जब वो आह भरेगा छाया में

न जाने कितने गुनाह हो गए
जब तक रहा हूँ दुनिआ में
अब जाते जाते यही कर जाऊं
वो तो नजर आएगा दुनिआ में

कर्म करेंगे अच्छे
तो याद करेगी दुनिआ
वर्ना तो घास फूस की तरफ
मसल के रख देगी दुनिआ

अजीत कुमार तलवार
मेरठ

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