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मौज के दोहे

*मौज*के दोहे…….

नमन करूं मां शारदे,शीश राखिए हाथ।
लेखन मान बढाइए, रहिए मां नित साथ।।

नमन है गुरूदेव को,दिया अनौखा ज्ञान।
कलम थमाई हाथ में,बढ़ा गुरू का मान।।

कलम कटारी बन गई,करे पाप का नाश।
लिखती सत के साज को,काटे झूठे पाश।।

लिखती हूं मनभावना, सीखूं नये विधान।
स्याही भरती प्रेम की,करूं कलम संधान।।

लिखूं प्रेम अनुराग मैं, करुणा दया विधान।
मानवता के मूल में,सात सुखों की तान ।।

लिखे कलम नित आरती, पढ़कर वेद-पुरान।
लिख नेकी-ईमान को, कहती पाक कुरान।।

जहां कलम का राज है,जनता की सरकार।
जग हितकारी काज है, लेखन की दरकार।।

सखी कलम हथियार है,रचती सद्य विचार ।
दूर करे अज्ञानता, काटे कूट विकार।।

रच दूं नित नूतन सखी, छंद-बंध- तुक -रास।
बालक मन की कामना,मुक्तक -मधुर-विलास।।

कागज-कलम,दवात को,सदा राखिए साथ।
“मौज” कविता कामिनी,रखती पकड़े हाथ।।

बाबा भोलेनाथ की,होती जय जयकार।
मैं भोले की लाड़ली,शिव मेरी सरकार।।

भोले तेरी आरती, मम जीवन आधार।
सदा सहायक शिव हुए, हर सपना साकार।।

मेरे शिव जैसा नहीं, कोई भी भगवान ।
पल भर में झोली भरे,बाबा दे वरदान।।

डमरूधर के नाम का, करता है जो जाप।
सुखदायक जीवन रहे,मिट जाते हैं पाप।।

भोले तेरी साधना, है मेरा विश्वास।
शिव कृपा की छांव है,पल-पल मेरे पास।।

नीच मनुज की नीचता,बने जगत पर भार।
“मौज” बढ़े सत्कर्म को,ओछा खाए खार।।

जग हितकारी भावना,करती जगत कल्याण।
अधम मनुज के हेत में, “मौज” पाप के बाण।।

बालक को बख्शे नहीं,लालच की सरकार।
खाए लीद पसार दे, रहे टपकती लार।।

जिसने भूली मनुजता,उसका बेड़ा चूर।
जीवन भर घिसता रहे,पड़ती माथे धूर।।

“मौज” पटे इक पल नहीं,बुरे मिनख के साथ।
झूठा, जालिम,काइयां,भला नहीं दो हाथ।।

सुख सुखिया दुख दारुणा,इस जीवन के साथ।
“मौज” गरब कैसे करे, सुख-दुख दोनों हाथ।।

आज घड़ी सुख की मिली,कल की जाने राम।
“मौज” जिंदगी समरसी,जीना करते काम ।।

सुख छाया दुख धूपरी,करम करे अनुपात।
“मौज” किया सो पाएगा,फल,डाली या पात।।

सबके सुख की कामना,करती आठों याम।
“मौज” मनुजता धरम की,भोर से ढली शाम।।

सुख चाहूं दुख मिल रहा,कैसा नियति विधान।
बिना करम कैसे मिले, “मौज” परम सुख ज्ञान।।

मतलब के बाजार में,बिकता सब सामान।
जीवन का व्यापार तो, “मौज” हुआ आसान।।

मन मतलब का पाहुना,लालच कर इतराय।
मेरा-तेरा कर रहा, “मौज” मनुज सरसाय ।।

मतलब की बोली लगे,बिकने लगते लोग।
“मौज” प्रेम छोटा लगे, बड़े हो रहे भोग ।।

सुख-सुविधा के नाम को,समझा जीवन सार।
मतलब की यहां दोस्ती, “मौज” मनुजता भार।।

चलो सखी मतलब गली, सीखें लोकाचार ।
दया-धर्म सब गौण हैं, “मौज” मतलबी प्यार।।

मतलब की मनुहार है,मतलब का है मीत ।
एक तराजू तुल रहे, “मौज” रंज-गम-प्रीत ।।

मतलब में मीठे लगें, खोटे-कड़वे बोल ।
बिना मौत मरने लगे, “मौज”मधुर मन कौल।।

चार दिनों की प्रीत है, चार दिनों का हेत।
जनम-जनम के प्रेम की, “मौज”उड़ रही रेत।।

जग-मतलब के खेल में,जीत गए होशियार ।
भोले मन को हारने, “मौज” रहो तैयार ।।

भली करे करतार तो,मिटे मतलबी प्यास ।
स्वार्थ का धूंआ हटे , “मौज” लगाती आस ।।

*विमला महरिया “मौज”*

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