मोह एक जाल है ।

सदा बहार को बहारता मनुष्य रोष से ।
वही चरित्र वान है बचा रहे जो दोष से ।
यहां न कोई दीन है न दीनता विभावरी ।
सभी के साथ ईश की कृपा महान रावारी ।
भ्रांति में न तोश शांति संसृता बढ़ावती ।
करती है चित को चिति से छूछ दिव्यता ढ़हावाती ।
उधार के लिए उघार दो ओहार मोह का ।
तरो स्वयं तरी बनों बचे रहो जो द्वेष से ।

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