कविता · Reading time: 1 minute

मोहब्बत

आज फिर,से नई, बात हो, गई ।
रात का,ली हँसी, रात हो, गई।।

उसका दी ,दार तो,आज हो,गया , देखिये ,प्रेम वर ,सात हो, गई।।

लौट आ यी थी वो सब खुशियाँ मेरी
ये उदासी की शुरुआत हो गयी।।

जब विछड़ कर वो जाने लगे थे ,
जिंदगी में ग़म की रात हो गई।।

मुझसे रूठा मुकद्दर था मेरा ,
जीतते जीतते मात हो गई।।

जुर्म क्या था मेरा आप बतलाइए,
जो मुझको ये हवालात हो गई।।

कुछ समझ मे न आया दिवाकर ,
जाने कैसे ये हालात हो गई।।

दिवाकर चंद्र त्रिपाठी ।
रायपुर- छत्तीसगढ़ ।

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