तीन शेर***

ठुकरा दिये उसके दिये सारे तख्तो ताज हमने ;
मुझको मालूम था तब फकीरी में जीने का मजा |

मेरी हस्ती की फिकर करने वाले जरा तू भी;
भंवर में डूबती अपनी कश्ती को बचा |

उसके तालुके से कोई ताअल्लुक नहीं मेरा,
मुझको मेरे ही शहर की दो गज जमीन काफी है |

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एक हिन्दी कवि एवं लेखक जो कविता, गीत, गजल, मुक्तक, दोहा, छंद रचनाकार श्रंगार रस...
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