तीन शेर***

ठुकरा दिये उसके दिये सारे तख्तो ताज हमने ;
मुझको मालूम था तब फकीरी में जीने का मजा |

मेरी हस्ती की फिकर करने वाले जरा तू भी;
भंवर में डूबती अपनी कश्ती को बचा |

उसके तालुके से कोई ताअल्लुक नहीं मेरा,
मुझको मेरे ही शहर की दो गज जमीन काफी है |

Like Comment 0
Views 272

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share