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” मोहब्बत के परिंदे “

लौट के आजा मेरी मोहब्बत के परिंदे,
कद्र नहीं तेरा इस जहां में कहीं,
इब्तिसाम लुटाए थे जो उस बेरहम पे,
उन्हें उनकी राहों में छोड़ जा वहीं।

लगी प्रीति की रीति मुश्किल है निभाना,
विकल वेदना क्या समझेगा जमाना,
जो कल खेले थे मेरे जज़्बातों से,आज
ढूढ़ते हैं ऐब और पूछते हैं ठिकाना।

वक्त की फ़रामोशी को यूं माफ़ कर,
बेवफ़ाई की धूल आब-ए-चश्म से साफ कर,
हों खता कुछ मेरी तो ज़रा याद तो दिला,
भर दूंगा ज़ख़्म तेरा जान अपना गवां कर।

दिल ये नादान संभाले से भी न संभला,
जान लुटा बैठे एक बेवफा के लिए,
पता होती काश मुझे ये मुश्किल जुदाई,
तो टूटते न सपनें यूं सदा के लिए।

दुनियां में एहसानों की फ़िक्र है अब किसे,
तन्हाइयों की छांव में वक्त भी ढलने लगे,
जो कल बिठाए थे अपनी पलकों पे सदा,
आज वे जनाजे की कब्र खोदने लगे।

झूठ कहने के लहज़े रहे न जिगर में,
सांच से उसका यूं रूठना ही सही,
मेरी शराफ़त की तुम तिजारत न करना,
कंटकों में भी राह निकलेंगे यहीं।

लौट के आजा मेरी मोहब्बत के परिंदे,
कद्र नहीं तेरा इस जहां में कहीं,
इब्तिसाम लुटाए थे जो उस बेरहम पे,
उन्हें उनकी राहों में छोड़ जा वहीं।

श्याम बिहारी ” मधुर ”
सोनभद्र, उत्तर प्रदेश

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