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अधूरा मिलन

उसके चिकने संगमरमर
से बदन पर
उंगलियां ऐसे फिसली
जैसे मक्खन से
निकली हो बिजली
उसके लबों से
अपने लबों में लंबी
गहरी सांस लेकर
हमने सोचा
चलो ना कह दें……

उसकी यादों को
अपने दिल में सजाकर
उसको अपने
सामियानें
पर बुलाकर
हरेक वस्त्र ऐसे
निकाला
जैसे गहरे सागर से
निकली हो मछली
शर्दी के मौसम में
उसके ज़िस्म की गर्मी से
अलाब जलाकर
हमने सोचा
चलो ना कह दें……….

उसकी नशीली नजरों के
पैमाने
घूँट घूँट पिये
उसके हुश्न के
नशे में लड़खड़ाते हुए
उसकी कमर
से संबल किया
कमर से नीचे पिसलते हुए
हमने सोचा
चलो ना कह दें…

उसकी चढ़ी हुई
गर्म साँसे
और इन्तजार में झुकी
बेबस पलकें
बदन को ऐसे घूरीं
जैसे नागिन की
निकली हो कंचली
आदि के आगोश में
पुंछल तारा गिरते हुए
हमने सोचा
चलो ना कह दें ।

बेबफ़ा को
बेबफ़ाई की सौगात तो
चाहते थे देना
मगर उसकी मजबूरी ने
बना दिया फिर से
उसका दीवाना
उसका लक्ष्य आसमाँ था
और हम थे
मिट्टी जमीं की
उसके बदन को
रेत से लपेटते हुए
हमने सोचा चलो
ना कह दें….

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प्रशांत सोलंकी
प्रशांत सोलंकी
Delhi.
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@@ ### मुंडे मुंडे मितरभिन्ना ## @@
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