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"मोहन से मिलने को आयी राधा मोहिनी"

“मनहरण घनाछरी छंद”

काजल लगा के चक्षु,शशि रुप धरे हुये,
मोहन से मिलने को,आयी राधा मोहिनी।
लोचन से लोचन का,मिलन होते ही राधा,
नाची जैसे नाचे मेघ देख,कोई मोरनी।
अधरों पे रख श्याम,मुरली बजाई जब,
कुंज कुंज नाच उठी,मुग्ध होके रागिनी।
चेहरे की आभा देख,चकित है भव सारा,
दंभ करने वाली भी,दंग हुयी दामिनी।

कुछ शब्द अ्र्थ…
चक्षु=आँख, शशि=चन्द्रमा, लोचन=आँख,नयन
मेघ=बादल, अधरों=ओंठ कुंज=गली मुग्ध=भावविभोर,मगन आभा=चमक, भव=संसार
दंभ=घमंड,दंग=आश्च्र्य

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Vinod Kumar
Vinod Kumar
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