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मोरे घनश्याम

दिनेश एल०

दिनेश एल० "जैहिंद"

कविता

April 6, 2017

मोरे घनश्याम

दरश दिखा के
प्यास जगा के
कुछ क्षण मोरे
संग बीता के शाम !

मुझ विरहन को
तू छोड़ अकेला
कौन देस गया
हे मोरे घनशाम !

मैं पल-पल जलूँ
ना जिऊँ ना मरूँ
ढड़े नैनों से नीर
मन को ना आराम !

कजरा संग अँखियां
बिंदिया संग लिलरा
वेणी संग मोर जूड़ा
निक लागे नाहिं राम !

तुझ संग सब निक लागे
सब हौं अब तो अभागे
काहे का करूँ मो सिंगार
कौन नाहिं इनके दाम !

==============
दिनेश एल० “जैहिंद”
06. 02. 2017

Author
दिनेश एल०
मैं (दिनेश एल० "जैहिंद") ग्राम- जैथर, डाक - मशरक, जिला- छपरा (बिहार) का निवासी हूँ | मेरी शिक्षा-दीक्षा पश्चिम बंगाल में हुई है | विद्यार्थी-जीवन से ही साहित्य में रूचि होने के कारण आगे चलकर साहित्य-लेखन काे अपने जीवन का... Read more
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