कविता · Reading time: 1 minute

मोबाइल

मोबाइल
◆◆◆◆
मोबाइल जीवन का
अभिन्न अंग बन गया है,
ऐसे लगता है इसके बिना
जीवन में रखा ही क्या है?
मोबाइल जन की जरूरत है,
इसके बिना जीने की
अब न कोई सूरत है।
मोबाइल हमारी दिनचर्या का
हिस्सा हो गया है,
इसके बिना अब जीवन
मात्र किस्सा भर हो गया है।
ये सच है कि मोबाइल
हम सबकी जरूरत है
परंतु ध्यान रहे
सिक्के का दूसरा पहलू भी है,
इसके बहुत सारे
नकारात्मक पक्ष भी हैं।
यदि हम इसका उपयोग
जरूरत के हिसाब से करेंगे
तब तक तो सब ठीक है,
मगर यदि हमनें नशे की तरह
आदत बनाने की कोशिशें की
तो बहुत खतरनाक भी है।
कहा भी जाता है
अधिकता हर चीज की बुरी होती है,
फिर भला मोबाइल
कहाँ इससे बच सकती है।
इसलिए मोबाइल का भी सम्मान करो,
इसकी जरूरत समझो,उपयोग करो,
मगर मोबाइल के गुलाम न बनो
इससे बचकर रहो।
● सुधीर श्रीवास्तव

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संक्षिप्त परिचय ============ नाम-सुधीर कुमार श्रीवास्तव (सुधीर श्रीवास्तव) जन्मतिथि-01.07.1969 शिक्षा-स्नातक,आई.टी.आई.,पत्रकारिता प्रशिक्षण(पत्राचार) पिता -स्व.श्री ज्ञानप्रकाश श्रीवास्तव माता-स्व.विमला देवी धर्मपत्नी,-अंजू श्रीवास्तवा पुत्री-संस्कृति, गरिमा संप्रति-निजी कार्य स्थान-गोण्डा(उ.प्र.) साहित्यिक गतिविधियाँ-विभिन्न विधाओं की रचनाएं कहानियां,लघुकथाएं…
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