कविता · Reading time: 1 minute

“मोबाइल बना खिलौना”

“मोबाइल बना खिलौना”
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देखो, मोबाइल बना खिलौना,
इसके असर से बच्चे हो रहे काना।
जिसको देखो, बैठा है पकड़ एक कोना,
दृश्य देखकर लगता कितना घिनौना।।

बेटा देखे, बेटी देखे,
मां देखे और देखे इसको बाप।
कुछ इसपर पढ़ते,कुछ खेलते और,
कुछ करते इसपर कई पाप।।

असली पढ़ाई तो अब हो गई हवाई,
जब से कान में ठेपी और कंझप्पा लगाई।
पता नही क्या है इस मर्ज की दवाई,
इस यंत्र ने बिगाड़ दिए कितनों की लुगाई।।

नौकरी पाना अब हो गया कितना आसान,
इसको लूट ले जा रहे, मोबाइल रहित इंसान।
अक्ल का जिसको मिला था वरदान,
वो तो मोबाइलिक यंत्र से ही परेशान।।

मोबाइल ने कितनों को कवि बनाया,
और कितनों को बनाया लेखक।
कितने ही प्रेमी -प्रेमिका को मिलाया,
और कितनों को बनाया कई मंचो का सचेतक।।

इसने बिसरा दिया दूरभाष और डाक- तार को,
खत्म कर दिया हमारे सारे पत्राचार को।
इसके चलते तरसते लोग आपसी प्यार को,
प्रभावित किया है इसने सबके आचार- व्यवहार को।।

वैसे जगह -जगह मोबाइल बना है वरदान,
इससे अपनों के संपर्क में रहना हो गया बहुत आसान।
कुछ भी हो, जीवन में ये अब बहुत जरूरी है,
इसको संग रखना सबकी मजबूरी है।। 🙏 🙏

स्वरचित सह मौलिक

पंकज कर्ण
कटिहार
संपर्क-8936068909

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Author
"शिक्षक"... MA. (Hindi, Psychology & Education) B.Ed , LL.B (BHU),
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