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मै शब्दो का मूर्तिकार शब्दो का महल बनाता हूं।

Vindhya Prakash Mishra

Vindhya Prakash Mishra

कविता

August 7, 2017

मै शब्दो का मूर्तिकार
मै शब्दो का महल बनाता हूं।
धन नही पैसे वाला है
मै संतोष धन कमाता हूं।
अमूर्त कल्पना चिंतन
मेरे दो अस्त्र निराले
मै कविता के संग जीता
कविता के संग पीता खाता हूं।
जीवन साहित्य हवाले
चिंतन संग जगता सोता हूँ ।
मैने जो लिखा कहा है
प्रतिपल होती अनुभूति
मै लिखकर बढता जाता हूँ ।
तब जाकर बनता गीत
शब्द गढता शब्द शिल्पी
हो गयी गीत से प्रीत।
मै शब्दो का मूर्तिकार
मै शब्दो का महल बनाता हूं।
विन्ध्यप्रकाश मिश्र

Author
Vindhya Prakash Mishra
Vindhya Prakash Mishra Teacher at Saryu indra mahavidyalaya Sangramgarh pratapgarh up Mo 9198989831 कवि, अध्यापक
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