गीत · Reading time: 1 minute

मै एक किसान हुँ

रोती धरती
और अम्बर
मै परेशान हुँ
हाँ मै एक किसान हुँ।।

होती घोषणा
नित नयी
जीवन से बेहाल हुँ
हाँ मै एक किसान हुँ।।

टूटी झोपड़ी
फ़टे हैं कपड़े
हालत से बेजार हुँ
हाँ मैं एक किसान हुँ।।

कर्ज के बोझ से
मर रहा हूँ रोज
भूखे पेट सो रहा हुँ रोज
क्या मैं गुनहगार हुँ?
हाँ मै एक किसान हुँ।।

पेट भर सकू सब का
धरती से हो हरियाली
जीवन मे इस सोच से
ही अपनी लाचार हुँ
हाँ जी हाँ मै
भारत का किसान हुँ।।

✍संध्या चतुर्वेदी
मथुरा उप

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