कविता · Reading time: 1 minute

मैं

मुझे ढूँढता सा रहा
मेरा ‘मैं’
और मैं कहीं
कोेने में
स्वयं को
तलाशने में लगा रहा
सिमटते देह के
बिंदुओं को मेरी
परछाइयाँ भी
न लक्षित कर सकीं
अस्तित्व का संघर्ष
‘मैं’ करता रहा
पर तारीखें
तय कर चुकी थी
कि कब
पिंजरे से
‘मैं’ को निकलना था
कब यात्रा असीम की
ओर करनी थी
और कब
‘मैं’ को ‘मैं’
नहीं रहना था
और…….
एक दिन
सौंदर्य को निहारने वाली
वो आँखें
शून्य को
निहारती रह गई
इस तरह यात्रा
आरम्भ हो चुकी थी
पर ‘मैं’ का कुछ
अता-पता न था
सोनू हंस

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