.
Skip to content

मैं

Kokila Agarwal

Kokila Agarwal

कविता

January 16, 2017

गुज़रती हूं अंधेरो से
लिये तक़दीर हाथों में
बिखरती हूं सिमटती हूं
लिये उम्मीद ख्वाबों में

दोष किसका है किसके
सर लगे बस वक्त ही जाने
जीतकर धुंध से बाज़ी
सूरज अब निगाहों में

उलझ बस खो गये हैं दो
सिरे जीवन के नादां मन
पकड़ ले इक सिरा यूं ही
तू है रब की पनाहों में

Author
Kokila Agarwal
House wife, M. A , B. Ed., Fond of Reading & Writing
Recommended Posts
सरल हूं सरल लिखता हूँ
सरल हूं सरल दिखता हूं सरल हूं सरल लिखता हूं रोज देखता हूं अतरंगी दुनिया कभी हंसता कभी रोता हूं अपने जीवन के अनुभवों को... Read more
व्यथा ..निम्न मध्यम वर्ग की
NIRA Rani कविता Aug 23, 2016
व्यथा ...मध्यम वर्गीय की.. मै निम्न मध्यम वर्गीय परिवार का एक कमाउ ....पर लगता है बेरोजगार युवक हूं कमाता इतनी हूं कि पेट भर सकूं... Read more
?रखती हूं☣
Sonu Jain कविता Oct 27, 2017
?रखती हूं☣ तमाम दायरों से भी तुझे बाहर रखती हूं,,,, तेरी खातिर ही ये झुकने का हुनर रखती हूं,,,, आज तक टूटी हूं पर कभी... Read more
*  मैं महक हूं  *
मैं महक हूं बस तूं मुझे महसूस कर दूर हूं पर पास दिल से महसूस कर एक दिन ये ख़्वाब ही हक़ीक़त बने जाफ़रानी खुशबू... Read more