कविता · Reading time: 2 minutes

” मैं हूँ ममता “

” मैं हूँ ममता ”
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मैं हूँ ममता,
करुणामयी ममता,
माँ की ममता,
ओढ़ा कर आँचल की छाँव में,
पूरी करती मैं,हर ख़्वाहिशों को।
मैं फर्क़ नहीं करती ,
छोटे और बड़े में,
लड़का और लड़की में,
सबल और दिव्यांग में,
कुचरित्र और चरित्रवान में।
लेकिन एक ही _
कमजोरी है मेरी कि,
मैं विभेद नहीं कर सकती,
तन और मन की वास्तविक खुशी को ,
मेरे कर्णपटल को बस ,
सुनाई पड़ती है,
अपने बच्चों के _
हर्षित तन के रोम- रोम की पुकार।
मेरे बोझिल चक्षुओ को सिर्फ दिखलाई पड़ती है,
उनके ऐसो आराम के समस्त भौतिक साधन।
मैं हूँ ममता,
करुणामयी ममता,
माँ की ममता,
मैं भूल जाती, पक्षियों के प्रातः चहकने की आवाज,
मैं कभी सोच नहीं पाती कि_
नभ में उड़ते ये नवजात परिंदे भी,
खुले आसमान में प्रातःकाल क्यों चहकते है?
जबकि मेरा लाडला नौजवान तो अभी,
बंद कमरे में बिस्तर पर यों ही पड़े हैं।
मैं हूँ ममता,
मैं उतनी निष्ठुर नहीं हो सकती कि _
उनके कलियुगी नींद में खलल डाल दूँ,
मैं इस खग वृंद की तरह निष्ठुर क्यों बनूँ,
जो कि अपने बच्चों को तब तक ही देते हैं,
अपने घोंसलों में प्रश्रय,
जब तक कि उड़ान के पंख नहीं आ जाते।
मैं हूँ ममता,
करुणामयी ममता,
माँ की ममता,
भूल गयी मै अतीत की सच्चाई को,
जब जगत कल्याण के लिए,
कृष्ण के कर्मपथ वियोग में,
माँ यशोदा की ममता भी तड़पी थी,
भूल गयी मैं, त्रेतायुग की उन सारी घटनाओं को,
जब रघुकुलनंदन के कर्मपथ वियोग में,
माँ की ममता किस तरह व्यथित हुई थी।
सोचती मैं _
कुक्कुरमुत्ते की तरह फैलते वृद्धाश्रम,
कहीं मेरी ही बेहिसाब ममता का दुष्परिणाम तो नहीं?
लेकिन मैं कुछ नहीं कर सकती,
क्योंकि_
मैं हूँ ममता,
करुणामयी ममता,
माँ की ममता,
मैं तो बस चुमूंगी, उनके कपालों को प्यार से,
मैं तो बस सहलाउंगी,उनके बालों को दुलार से,
मैं बस स्नेह से थपथपाउंगी,उनके पीठ को।
ममता की छाँव बनाऊँगी,
उसे खुले धूप से बचाने को।
मैं तो ठंड-गर्म हवा के थपेड़ों से उसे बचाऊंगी ,
अहर्निश,अविरल,हरपल,पल-पल।
क्योकि _
मैं हूँ ममता,
करुणामयी ममता,
माँ की ममता,
बहुत दिन बीत गए ममता के आंचल दिए ,
अब मन खटकता क्यों है?
मन में एक अपराध बोध सा एहसास क्यों है?
क्यों मैं सोचती हर पल?
काश! मैंने भी इन शागिर्दों को बनाया होता,
सहने लायक_
सुख-दुख के थपेड़ों को सहने लायक,
धूप की तपिश में दमकने लायक,
भीड़ में गुम न हो जाने लायक,
सबों की जिम्मेदारी उठाने लायक,
भटकों को राह दिखाने लायक।
अब क्यों हो रहा पश्चाताप,
क्यों बहते आंखों से अश्रु निर्झर?
क्यों बन गई ?
ममता ही ममता का दुश्मन!
आखिर क्यों???

(माँ की ममता अनमोल है, इस पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता है, यह रचना बदलते परिवेश में कुछ माताओं का अपने बच्चों के प्रति ज्यादा लाड़-दुलार को ध्यान में रखते हुए सामाजिक परिस्थिति पर एक कटाक्ष मात्र है)

मौलिक एवं स्वरचित

© *मनोज कुमार कर्ण
कटिहार ( बिहार )
तिथि – २३/०६/२०२१
मोबाइल न. – 8757227201

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