कविता · Reading time: 1 minute

मैं ही मैं

कोरोना ने
‘मैं’ को
नए सिरे से परिभाषित कर दिया है.
‘मैं’ ही कारक
‘मैं’ ही हन्ता
और ‘मैं’ ही नियंता को
स्थापित कर दिया है
नेपथ्य में बैठा
कोरोना परिवार का यह नया सदस्य.
‘मैं’, ‘मैं’ और केवल ‘मैं’
एकान्त के सन्नाटे को
महसूस करेगा.
और ‘मैं’ बनने की दौड़ के लिए
दण्डित भी
यही,
‘मैं’ ही होगा.
और अंततः
भय के पसरे साम्राज्य को,
‘मैं’ ही तोड़ेगा,
अस्तु,
उठो ‘मैं’
सजग हो,
तोड़ो इस ‘मैं’
के कारा को.
( 24.03.2020 )

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विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख, कहानियां, व्यंग्य, कविताएं आदि प्रकाशित। 'कर्फ्यू में शहर' काव्य संग्रह, पंचफोरन व्यंग्य संग्रह प्रकाशित । सामान्य ज्ञान दिग्दर्शन, दिल्ली : सम्पूर्ण अध्ययन, वेस्ट बंगाल : एट…
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