मैं हवा हूं

मैं हवा हूं कभी रुकता ही नहीं
तू खुशबू है तो मेरे संग चल।
मैं सूरज हूं कभी थकता ही नहीं
तू रौशनी है तो मेरे साथ निकल।।

आरज़ू कई इस दिल में समाये हुए
ख्वाब के समन्दर आंखों में बसाये हुए
इश्क का बोझ दिल पर उठाये हुए
सारी दुनिया को खुद से आजमाये हुए
तेरी चाहत के नूर से हम नहाये हुए

मैं पानी हूं कभी मरता ही नहीं
तू प्यास है तो मेरी चाह में बदल।।

बात मन की जुबां पर फिर लाये हुए
आपके आने की आहट पर मन लगाये हुए
इस ज़माने की नजरों से बचाये हुए
अपनी सोच से दिल का आंगन सजाये हुए
तुमको ख्वाब से हकीकत में आवाज लगाये हुए

मैं आग हूं कभी जलता ही नहीं
तू ईंधन है तो मेरे ताप में बस जल।।

चांदनी रात में अपने तन को महकाये हुए
मिलन की चाह में बेचैन दिल को समझाये हुए
हवा से आपको पैगाम देकर बुलाये हुए
हाथ में अपनी इन लकीरों को बैठाये हुए
जुबां पे मुहब्बत का तरन्नुम गुनगुनाये हुए

मैं इंद्रधनुष हूं कभी टिकता ही नहीं
तू रंग है तो आज मेरे अंग में ढल।।

हर रोज तेरी याद से यहां सताये हुए
नींद लापता इन आंखों को जगाये हुए
वक्त का पता नहीं खुद को भी भुलाये हुए
तेरी तस्वीर को सीने से चिपकाये हुए
तेरे आने की कशीश में हर दिन बिताये हुए

मैं दिल का सौदागर हूं कभी बिकता ही नहीं
तू दिल है मेरा तो ख़ोज मेरे दिल का हल।।

पूर्णतः मौलिक स्वरचित सृजन की अलख
आदित्य कुमार भारती
टेंगनमाड़ा, बिलासपुर,छ.ग.

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